
गाजीपुर। मनिहारी ब्लॉक के धाँवा गांव में प्राचीन अवशेषों को लेकर किए गए प्रयास अब महत्वपूर्ण परिणामों के रूप में सामने आने लगे हैं। समाजसेवी सिद्धार्थ राय ने इस मुद्दे को उठाया एवं भेजे पत्रों के बाद संज्ञान राज्य पुरातत्व विभाग ने लिया। इसके बाद बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की टीम ने धाँवा में क्षेत्रीय सर्वेक्षण किया।दस मई को बीएचयू की सर्वेक्षण टीम गाँव में पहुँची। सर्वेक्षण दल का नेतृत्व विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. जोस टॉम राफेल ने किया। टीम में मनीष राय, प्रतीक पांडेय, सत्यम भारती, श्रवण सिंह, नेहा सिंह (सीनियर रिसर्च स्कॉलर), कौस्तुभ संग्राम, रितेश, स्मृति एवं हिमांशु सिंह (मास्टर्स छात्र) शामिल रहे। टीम ने गाँव के भीतर सात विभिन्न स्थलों का दस्तावेजीकरण करते हुए कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त किए।सर्वेक्षण में मंदिर स्थापत्य अवशेष, शिवलिंग का अरघा, मध्यकालीन ईंटें, तीन प्राचीन कुएँ, अंगूठे के निशान वाले टेराकोटा डिस्क, ग्लेज़्ड वेयर, अभ्रकीय लाल मृदभांड, लौह अवशेष, मनके, भगवान विष्णु की संभावित खंडित प्रतिमा, तथा एक छोटे टीले के सतह पर दिखाई देने वाले पशुओं के दाँत एवं अस्थि अवशेष जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले।सर्वेक्षण दल के अनुसार, ये अवशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि ग्राम धाँवा मध्यकाल में एक महत्वपूर्ण मानव बसावट रहा होगा। साथ ही, कई पुरावशेष ऐसे भी मिले हैं जो इससे भी प्राचीन काल की सांस्कृतिक एवं मानवीय गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं।उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा क्षेत्रीय पुरातत्व इकाई, वाराणसी को स्थल निरीक्षण कर विस्तृत आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश भी जारी किए गए थे।समाजसेवी सिद्धार्थ राय ने कहा कि यदि ग्राम धाँवा में वैज्ञानिक एवं विस्तृत पुरातात्विक अध्ययन कराया जाए, तो यह क्षेत्र पूर्वांचल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में अपनी पहचान बना सकता है।
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बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति पुरातत्व विभाग की टीम के मनीष राय ने बताया कि समाजसेवी सिद्धार्थ राय के पहल पर हमारी टीम मनिहारी ब्लाक के धांवा गांव पहुंची थी।वहां गांव के पास एक पुराने पोखरे के बीच टीला मिला ।जिसका सर्वेक्षण किया गया तो उसमें विभिन्न प्रकार के पत्थर के पाटली मिले । जो करीब पांच सौ से एक हजार वर्ष पुराने प्रतीत हो रहे हैं।उन्होने बताया कि एक हजार साल पहले यहां बसावट का प्रमाण मिल रहा है। शीशे बनाने के भी कुछ उपकरण मिले है। जो शिवलिंग का अरघा, खंडित मूर्तिया, सिलवट्टा का प्रमाण मिला है । इस टीले में जानवर के हड्डियों के अवशेष भी मिले हैं। इसका खनन करवाया जाय तो पुराने अवशेष मिलने की उम्मीद है।




